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अधूरे ख्वाब और अंतिम अलविदा

 मुझे शौक नही किसी के जैसा बनने का, मै जो हूँ वही अंत तक रहना चाहुंगा ... जब होगा आभास अंतिम पड़ाव का, तो जाने से पहले कुछ बात कह के जाऊंगा... उठाना मेरी इन्ही शब्दो को मेरी डायरी मे, मै बहुत सी चीजे लिख के जाऊंगा .... मै बढा कुछ सपनो के साथ था यहां तक, पर कुछ अधुरे ख्वाब भी मै अपने साथ ले जाऊंगा.... मेरे हर शब्द का ज़िकर करोगे तुम, मै तुम सबसे किया हर वचन निभाऊंगा .... मुझपे कब कहां कितना खर्च करना है, ये सब भी बता के जाऊंगा... मुझे मार तो बहुत से लोगो ने पहले दिया था, बस अंतिम अलविदा कहने के लिये आऊंगा .... ये अच्छे का चोला पहने हुये लोग, बुरो से बत्तर निकले, मै इनके लिये गलत था, गलत हूँ और अंत तक गलत बन के जाऊंगा ... मुझे कोई दुख नही मुझे ज़िससे जो भी मिला, बस दुख ये रहेगा कि जो हकदार नही था, उसे अकेला कर जाऊंगा .... मुझे जनम मिले तो यही मां यही भाई यही पिता यही बहन हो, और जीवन संगनी सदा तुझे ही चाहुंगा .... मुझे मेरे पिता का हिस्सा मिला संघर्ष का, कोई खेद नही होगा अगर अंत मे भी ऐसे ही जाऊंगा ... बस इतना ही क...

मैं हूँ और परेशान बहुत हूँ – अपने ही लोगों से हैरान एक भावुक कविता

"मैं हूँ और परेशान बहुत हूँ" – यह कविता हमारे जीवन के उस दर्द को बयाँ करती है जब अपने ही लोग हमें समझने के बजाय सवाल करते हैं। रिश्तों की उलझनों और अपनों के व्यवहार से हैरान दिल की गहराई इस भावुक कविता में झलकती है। ब्लॉग पढ़ें और महसूस करें अपनेपन की सच्चाई। कविता: अपनों की दुनिया में, मैं अजनबी-सा क्यों लगता हूँ, हँसी के मेले में भी, अंदर से टूटा-सा रहता हूँ। वो पहचान जिन्हें अपनेपन का नाम देता था, आज वही आईने में सवाल बनकर खड़ा मिलता हूँ। हाँ, मैं हूँ... और परेशान बहुत हूँ, अपने ही लोगो के लिए, क्रित्य से हैरान बहुत हूँ... --- बातें सुनते हो तुम, पर समझते नहीं हो, मेरी चुप्पी को ग़लत अर्थों में परखते नहीं हो। दिल का बोझ जब लफ़्ज़ों में उतरता है, तो लोग कहते हैं—“ये तो बस कहने की आदत है।” हाँ, मैं हूँ... और परेशान बहुत हूँ, अपने ही लोगो के लिए, क्रित्य से हैरान बहुत हूँ... --- सपनों के शहर में, उम्मीदें टूटी सी पड़ी हैं, रिश्तों की किताब में, खाली पन्ने जुड़ी हैं। फिर भी मैं चलता हूँ, गिरकर सँभलता हूँ, आँधियों के बीच भी, अपने होने का ऐलान करता हूँ। हाँ, मैं हूँ... और परेशान...

पिता की चिता से मज़बूत बनने तक – मेरी अधूरी कहानी

 जिस दिन मैंने अपने पिता को अंतिम बार कांधा दिया, उसी दिन शायद मैं ख़ुद को खो बैठा और एक नया मैं जन्म ले लिया। वो दिन मेरे जीवन का सबसे काला दिन था—जिसे याद करते हुए आज भी दिल कांप जाता है। पिता की मौत के बाद ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी ने अचानक मेरे कंधों पर बोझ डाल दिया हो। कल तक मैं नासमझ और बेफ़िक्र सा था, लेकिन उस एक दिन ने मुझे पल भर में बूढ़ा कर दिया। जो हाथ बचपन से मेरी उंगली थामे हुए थे, वो हाथ आज सदा के लिए छूट गए। --- अपनों से दूर होते हुए भी मज़बूत होना सबसे बड़ा दर्द मौत का नहीं था, बल्कि वो था जब अपने ही सगे धीरे-धीरे किनारा करने लगे। तानों के तीर चले— कभी मेरे पिता पर, कभी मेरी माँ पर, कभी मेरी बहनों पर... जिनसे सहारा मिलने की उम्मीद थी, वही सिर्फ़ बोझ समझने लगे। उस समय समझ आया कि लोग साथ तब तक हैं जब तक आपके पास कुछ है देने को। और जब आप टूटा हुआ इंसान होते हो, तब वही अपनों का झुंड सबसे पहले दूरी बना लेता है। --- मजबूरी से मज़बूती तक का सफर  मैंने न रोने दिया खुद को ज़्यादा, न गिरने दिया। क्योंकि हर रात जब आँसू बहते थे, अगली सुबह मुझे और मज़बूत होना पड़ता था। जैसे-जैसे...

खोकर पाया – मेरे पिता श्री महेश चन्द्र की कहानी

 खोकर पाया – मेरे पिता श्री महेश  चन्द्र की कहानी महेश सिर्फ़ पंद्रह साल का था, जब उसके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। घर में चार भाई, दो बहनें, बूढ़ी माँ और जिम्मेदारियों का पहाड़। उस दिन से बचपन खत्म हो गया और एक अधूरा आदमी बनने की शुरुआत हो गई। महेश ने अपनी जवानी अपने परिवार के नाम कर दी— छोटे भाइयों को पढ़ाया, बहनों की शादियाँ कराईं, माँ का इलाज कराया, हर त्योहार पर सबके घर में खुशियाँ पहुँचाईं। वह खुद चाहे पुराने कपड़ों में रहा, लेकिन भाई-बहनों के लिए सबसे अच्छा लाया। कच्ची  छत  हटा  के उन्हे  पक्का  मकान  दिया... समय बीता, भाई पढ़-लिखकर बड़े पदों पर पहुँचे, बहनें अपने घर-गृहस्थी में रम गईं। सब  अपना  अपना  अपना  देखने  लगे, सब  लग  गये  अपने  बच्चो  को बनाने  मे.. लेकिन महेश…? उसके पास न घर था, न बचत, न अपने बच्चों के लिए कोई सुरक्षा। जो कुछ कमाया, सब दूसरों पर लुटा दिया। और कड़वा सच तो यह था— माँ ने भी उसे कभी सही मायने में नहीं समझा। जब भी कोई बात बिगड़ती, घर का हर दोष उसी के सिर मढ़ दिया...

सब धरा रह जाएगा – लोभ, ताक़त और पछतावे पर जीवन की सच्ची कविता

"सब धरा रह जाएगा" सब धरा रह जाएगा, जब अचानक से बुलावा आएगा। ना तेरा धन, ना तेरी शोहरत, ना तेरा पद, ना तेरी ताक़त— कुछ भी साथ ना जाएगा, बस कर्मों का हिसाब आएगा। तू दौड़ा लूटने को हर मोक़ा, छीन ली तूने अपनों की रोशनी का शोला, इज्ज़त बांटने में तुझसे क्यों कंजूसी हुई? पर अपमान देने में तुझसे जल्दी हुई। तूने समझा था कि सब तेरे आगे झुकेंगे, तेरे नाम से दरवाज़े खुलेंगे, पर एक दिन तेरे सामने दरवाज़ा बंद होगा, जिसे कोई रिश्वत, कोई ताक़त, कोई सिफ़ारिश नहीं खोलेगी। वक़्त चुपचाप हिसाब रखता है, ताक़त की घड़ी, और कमजोरी का पल— दोनों लिखता है। जब बुलावा आएगा, तू अकेला होगा… भीड़ भी तुझसे दूर खड़ी होगी। तब समझ आएगा, दौलत बाँटनी थी, इज्ज़त देनी थी, मोह माया छोड़कर सच्चाई जीनी थी। पर तब तक देर हो चुकी होगी… और सब धरा रह जाएगा।        - by Aashu Chandra 🖊 

घर की बड़ी बहू का दर्द – भेदभाव और तिरस्कार पर भावुक कविता

 मुखड़ा: दिल ने तो चाहा था, सबको अपना कहूँ, पर हर मोड़ पे बस, तिरस्कार ही सहूँ, मैं घर की बड़ी बहू, मैं घर की बड़ी बहू… अंतरा 1 आई थी सपनों के संग, इस चौखट पर, मन में था प्रेम, लबालब भर, सोचा था सब एक-सा मानेंगे, हर रिश्ते में ममता जानेंगे, पर बांट दिया मुझको, रिश्तों के पलड़ों में, कभी हल्की तौली गई, कभी भूल गई गलियों में… मुखड़ा दिल ने तो चाहा था, सबको अपना कहूँ, पर हर मोड़ पे बस, तिरस्कार ही सहूँ, मैं घर की बड़ी बहू, मैं घर की बड़ी बहू… अंतरा 2 पति था घर का सबसे बड़ा सहारा, पर उसी को सबसे दूर का किनारा, भाई-भाभी ने जितना दिया, हमने भी दिया, कई बार तो अपना हिस्सा भी जिया, फिर भी मिला तो बस तानों का जाल, और आँखों में ठंडा, पर कटता हुआ सवाल… मुखड़ा दिल ने तो चाहा था, सबको अपना कहूँ, पर हर मोड़ पे बस, तिरस्कार ही सहूँ, मैं घर की बड़ी बहू, मैं घर की बड़ी बहू… अंतरा 3 त्याग की गठरी सिर पर उठाई, ख़्वाहिशें अपने हाथों दबाई, हर बहू को बेटी सा अपनाया, पर मुझे कभी बेटी ना बुलाया, अब बैठी हूँ इस सूने से कमरे में, दुआएँ अब भी पलती हैं दिल के कोनों में… मुखड़ा (समापन) दिल ने तो चाहा था, सबको ...

खामोशी का ज़हर: जब दर्द बोलने से भी डरता है

ज़िंदगी में ऐसे पल आते हैं, जब हम चिल्लाना चाहते हैं, रोना चाहते है, लेकिन आवाज़ गले में ही घुट जाती है। ये वही पल हैं जब चुप्पी, हमारे भीतर ज़हर की तरह फैलने लगती है। यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं, उन सभी की है जिन्होंने अपने दर्द को छुपाकर मुस्कुराने की कोशिश की। पिता का जाना – पहली चोट पिता के जाने के बाद घर का आँगन खाली हो गया। वो सहारा, वो हौसला… सब चला गया। रिश्तेदार आए, दो आँसू बहाए, और फिर अपनी-अपनी दुनिया में लौट गए। बस मैं रह गया — और मेरी चुप्पी, जो धीरे-धीरे मेरे खून में घुलने लगी। पैसों की तंगी और टूटे सपने रोटियों की तलाश में दिन गुज़रते गए, लेकिन जेब हमेशा खाली रही। जो सपने आँखों में थे, वो एक-एक करके गिरते चले गए। जिनके लिए मैंने अपनी नींद और चैन तक बेच डाला, उन्होंने सुबह उठकर मेरी मेहनत पर ही सवाल खड़े कर दिए। साथियों का धोखा कुछ चेहरे ऐसे भी थे, जिन पर भरोसा था। लगा कि ये साथ देंगे, लेकिन जब मेरी नाव डूब रही थी, वही किनारे खड़े होकर तमाशा देखते रहे। भरोसा टूट गया, और दिल ने खुद से वादा कर लिया — अब किसी से लगाव नहीं रखना। बस कुछ चेहरे बाकी हैं आज भी दो-चार लोग हैं जो मेरी...

जब शब्द मर गए और बस ज़हर बचा

 पिता के बाद जिस घर में रोशनी जलनी थी, वहाँ अँधेरे ने अपना ताज पहन लिया, जिन्हें अपना समझा था, वही दूरियाँ नापते रहे, मेरे आँसुओं से उनके दरवाज़े भीगते रहे, और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया। रोटियों की तलाश में कई बरस काले हो गए, जेब में छेद थे और सपने राख हो गए, जिनके लिए रातों का सारा चैन बेच डाला, सुबह उन्होंने ही मेरे सिर पर पत्थर डाला, और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया। बेरोज़गारी ने हर दिन का गर्व निचोड़ लिया, भीड़ में मेरा नाम किसी ने नहीं जोड़ा लिया, जिनके काँधों पर मैं आंधी में भी छाया बना, आज वही मुझे देख कर रास्ता बदलने लगे, और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया। अब दिल को किसी अपने की तलाश नहीं, सिर्फ कुछ चेहरे हैं जो अब भी हवा देते हैं सही, बाक़ी सब मेरे किस्सों के कब्रिस्तान में सो गए, बस मैं और मेरी ख़ामोशी इस दुनिया से हो गए, और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया। - by Aashu Chandra 🖊 

चुप्पी का समंदर

 " चुप्पी का समंदर" पिता के जाने के बाद, घर का आँगन सूना हुआ, रिश्तों के मेले में भी मैं तन्हा-सा कोना हुआ, जिसे सहारा कहा, वही सबसे दूर चला, टूटे सपनों पर ओस-सा दर्द पला, और मेरी चुप्पी का समंदर, बस गहरा और गहरा हुआ। पैसों की तंगी ने नींद को गिरवी रख लिया, हर चाहत ने खुद को कोनों में रख लिया, जिनके लिए रातों को जलता दिया, सुबह उन्होंने ही अँधेरा फैला दिया, और मेरी चुप्पी का समंदर, बस गहरा और गहरा हुआ। बेरोज़गारी की धूप में पाँव जलते रहे, सफ़र के साथी भी किनारों पर चलते रहे, जिन हाथों ने काँटों में भी साथ दिया, आज उन्होंने ही मेरा रास्ता बाँध दिया, और मेरी चुप्पी का समंदर, बस गहरा और गहरा हुआ। अब न किसी से लगाव, न किसी से उम्मीद, बस कुछ चेहरे हैं जो अब भी हैं पास और करीब, बाक़ी सब स्मृतियों में खो गए कहीं, बस मैं और मेरी खामोशी रह गए यहीं, और मेरी चुप्पी का समंदर, बस गहरा और गहरा हुआ।

अहंकार किस बात का?

  अहंकार किस बात का? ज़िन्दगी मौका दे तो कुछ और बनना पर पिता जैसा बनने की कोशिश नही करना.. भगवान की बराबरी नही होती, ना उस जैसा दर्द तुम सह के जा पाओगे... बस इंसान बनना जो सबसे अलग रहे... जो छल को छल कहे ... जो गलत को सदा गलत कहे .... जीना फिर भीड़ मे किसी ऐसे खो जाना... जैसे अंगिनत बड़ी बुन्दो के बीच एक छोटी सी बुन्द... कोई जरूरत नही, लोग तुम्हे याद रखे.... माधव की माया ऐसी है, कि इंसान चन्द दिनो से जादा किसी के लिये नही रोता... जन्म देने वाले भी अपने ... तकलीफ देने वाले भी अपने ... अंत मे आग दे कर मुक्त करने वाले भी अपने.... दरअसल, कोई नही है, बस किरदार है तुम्हारा आज ज़िस जगह तुम हो, कल कोई और होगा... तुम जो भी हो इसी जनम मे हो किसी के, अहंकार राख होना ही है ! तुम्हारा जो भी बनाया हुआ है वो सब तो खोना ही है, ये आज मखमल सा बिस्तर भले पसंद हो तुम्हे, असली बिस्तर तो एक कोना ही है !!! - by Aashu Chandra 🖊 

हर किसी को संभालते-संभालते, वो खुद कहाँ खो गया — किसी ने न पूछा

- by Aashu Chandra 🖊  एक टूटा हुआ मन… एक थका हुआ कंधा… एक ऐसा इंसान, जो बस एक बार चाहता है कि कोई पूछे – " तू कैसा है? " "वो शब्‍द – जो कह नहीं पाया" ना कोई शिकवा, ना कोई फ़रियाद की, बस हर रिश्ता पूरी ईमानदारी से निभा दी। पर जो बात दिल में सबसे ज़्यादा थी, वो कभी अपनी बीवी-बच्चों से कह ना सका… मैंने पिता का साया बनके तुम सबको पाला, हर ज़िम्मेदारी को खुद से पहले टाला। तुम्हें हँसते देख कर अपने आँसू पी लिए, पर कभी न बताया… कि हर मुस्कान के पीछे, मेरे हिस्से की नींदें, ख्वाब, चैन, सब चले गए। घर चलाया, रिश्ते बचाए, कभी छोटे भाई की फ़ीस, तो कभी बहन की शादी में जान लगा दी। और जब अपना बच्चा किताबें माँगता था, तो मन ही मन टूटता था… क्योंकि जेबें खाली थीं — पर चेहरा फिर भी मुस्कराता रहा। बीवी से कभी कुछ नहीं माँगा, ना सुकून, ना समझ, ना सहारा। बस वो मुस्कुरा दे, यही दुआ करता रहा। पर एक बार चाहता था कि वो समझे — कि उसका आदमी सिर्फ़ ATM नहीं, एक थका हुआ इंसान भी है… मेरे बच्चों… तुम्हें पंख देना मेरा सपना था, इसलिए अपनी उड़ानें रोक दीं। पर अब जब तुम ऊँचाइयों पर हो, बस इतना पू...

वो बड़ा भाई: जो सबका था, पर ख़ुद का कभी न हो सका

 - by Aashu Chandra 🖊  "जिसने बचपन छोड़ा, ताकि सबका भविष्य बन सके…" "ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत… बस कंधों पर ज़िम्मेदारियाँ थीं।" "एक भाई, जिसने पिता की जगह ली… और ख़ुद को भुला दिया।" इस कविता में भाव है उस भाई के, जिसने अपने सपनों को तब कुर्बान कर दिया, जब उसके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं। जिसने सबके लिए जीया, पर आज जब मुड़कर देखता है — तो पाता है कि शायद कोई उसका नहीं रहा… बस एक डिब्बा, एक कहानी और एक खामोशी बची है। "बड़ा भाई" पंद्रह की उम्र में बाप बन गया, कंधों पर जनमों का बोझ ले लिया। सबको संवारते-संवारते ख़ुद बिखर गया, वो बड़ा भाई, जो सबका था… पर ख़ुद का कभी न हो सका। पिता गया, घर टूटा, पर उसने दीवार बन के सबको जोड़ा। रातें जाग कर सबका ख्याल रखा, और सुबहें काम में पसीने से नहाई। भाई पढ़े, बहनें ब्याही, माँ के लिए दवाई और दुआ लाया। हर त्यौहार में सबको हँसाया, पर अपने हिस्से की खुशी कभी न पाई। वो भी चाहता था बच्चा स्कूल जाए, पत्नी गहनों में मुस्काए, पर ज़िम्मेदारियों की दौड़ में वो कभी घर ही देर से लौट पाए। आज वही भाई, जिसे सबने सहारा...

जब पिता अकेला होता है: एक अदृश्य संघर्ष की कहानी

 - by Aashu Chandra 🖊  "जो हर दर्द खुद तक सीमित रखता है — वो पिता होता है।" "अकेलेपन में भी जिसकी हिम्मत सबके लिए कायम रहती है…" "पिता का सफर — चुपचाप चलता एक युद्ध…" हमारे जीवन में अगर कोई सबसे बड़ा योद्धा होता है, तो वह है — पिता। वह बाहर दुनिया से लड़ता है, और अंदर अपनों को मुस्कान देता है। जब वह अपने सफर पर अकेला होता है, मजबूर होता है, टूटता है — तब भी उसकी एक ही जिद होती है: "परिवार को कुछ न हो।" आज की कविता उसी पिता को समर्पित है — जो खुद अकेला चलता है, पर पूरे परिवार का भार उठाता है। कविता: "पिता का अकेलापन" वो खुद ही जख़्मी था, पर मरहम बनकर जीता रहा, अकेला था, मजबूर था — फिर भी हिम्मत सीता रहा। सफर उसका था कांटों भरा, पर हौसला फूल सा रखता, पिता था वो — जो अंधेरों में भी दीपक सा जलता रहा। बोलता नहीं था वो कभी, पर हर शब्द में चिन्ता थी। नींद उससे रूठ गई थी, पर आंखों में जिम्मेदारी की नमी थी। ठंडी रोटियाँ खाकर सोया, पर बच्चों को दूध पूरा मिला। खुद फटे जूते पहन चला, पर स्कूल में फीस वक्त से मिला। कभी स्टेशन, कभी सड़कों पर, कभी शह...

पिता का साथ: एक छांव जैसा रिश्ता जो उम्र भर साथ चलता है

 - by Aashu Chandra 🖊 "पिता वो दरख्त है जिसकी छांव कभी कम नहीं होती।" "जो बिना कुछ कहे सब सहता है — वो पिता होता है।" "पिता के बिना ज़िन्दगी अधूरी सी लगती है…" “पिता और उसका साथ” वो चलता रहा मेरे पीछे सदा, छांव बनकर, परछाईं सा। मैं गिरता रहा, वो थामता रहा, पिता था वो — बस नाम सा। दिन के उजाले में दिखे न कभी, पर रात की ठंडी हवा में था। वो थक कर भी मुस्कुरा देता, बिना कहे हर दवा में था। सपनों की उड़ान में जब डर लगा, हाथ पीछे से पकड़ता रहा। खुद की चाहतें कुर्बान कर, मेरी दुनिया सजाता रहा। न घाव दिखाए, न आंसू बहाए, बस छुप-छुपकर सब झेल गया। वो दीवार बना रहा हर दर्द में, और मैं नादान खेल गया। वो गुस्से में भी ममता रखता, वो खामोशी में भी सिखा गया। मैं जब कुछ बन गया ज़माने में, वो पीछे कहीं छुप सा गया। अब समझ आता है हर इक लम्हा, जब दूर गया तो क्या खो गया। जिसे सब कहते थे कठोर सा, असल में वही सबसे रो गया। --- मुक़ाम यही है पिता का जीवन में — कभी पहचाने नहीं जाते, पर उनकी गैरहाज़िरी सबसे ज़्यादा खलती है। #पिता, #पिता_की_कविता, #EmotionalPoem, #HindiKavita, #FamilyLo...