पिता का साथ: एक छांव जैसा रिश्ता जो उम्र भर साथ चलता है

 - by Aashu Chandra 🖊


"पिता वो दरख्त है जिसकी छांव कभी कम नहीं होती।"

"जो बिना कुछ कहे सब सहता है — वो पिता होता है।"

"पिता के बिना ज़िन्दगी अधूरी सी लगती है…"

“पिता और उसका साथ”

वो चलता रहा मेरे पीछे सदा,

छांव बनकर, परछाईं सा।

मैं गिरता रहा, वो थामता रहा,

पिता था वो — बस नाम सा।

दिन के उजाले में दिखे न कभी,

पर रात की ठंडी हवा में था।

वो थक कर भी मुस्कुरा देता,

बिना कहे हर दवा में था।

सपनों की उड़ान में जब डर लगा,

हाथ पीछे से पकड़ता रहा।

खुद की चाहतें कुर्बान कर,

मेरी दुनिया सजाता रहा।

न घाव दिखाए, न आंसू बहाए,

बस छुप-छुपकर सब झेल गया।

वो दीवार बना रहा हर दर्द में,

और मैं नादान खेल गया।

वो गुस्से में भी ममता रखता,

वो खामोशी में भी सिखा गया।

मैं जब कुछ बन गया ज़माने में,

वो पीछे कहीं छुप सा गया।

अब समझ आता है हर इक लम्हा,

जब दूर गया तो क्या खो गया।

जिसे सब कहते थे कठोर सा,

असल में वही सबसे रो गया।

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मुक़ाम यही है पिता का जीवन में —

कभी पहचाने नहीं जाते,

पर उनकी गैरहाज़िरी सबसे ज़्यादा खलती है।

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