घर की बड़ी बहू का दर्द – भेदभाव और तिरस्कार पर भावुक कविता

 मुखड़ा:

दिल ने तो चाहा था, सबको अपना कहूँ,

पर हर मोड़ पे बस, तिरस्कार ही सहूँ,

मैं घर की बड़ी बहू, मैं घर की बड़ी बहू…


अंतरा 1

आई थी सपनों के संग, इस चौखट पर,

मन में था प्रेम, लबालब भर,

सोचा था सब एक-सा मानेंगे,

हर रिश्ते में ममता जानेंगे,

पर बांट दिया मुझको, रिश्तों के पलड़ों में,

कभी हल्की तौली गई, कभी भूल गई गलियों में…


मुखड़ा

दिल ने तो चाहा था, सबको अपना कहूँ,

पर हर मोड़ पे बस, तिरस्कार ही सहूँ,

मैं घर की बड़ी बहू, मैं घर की बड़ी बहू…


अंतरा 2

पति था घर का सबसे बड़ा सहारा,

पर उसी को सबसे दूर का किनारा,

भाई-भाभी ने जितना दिया, हमने भी दिया,

कई बार तो अपना हिस्सा भी जिया,

फिर भी मिला तो बस तानों का जाल,

और आँखों में ठंडा, पर कटता हुआ सवाल…


मुखड़ा

दिल ने तो चाहा था, सबको अपना कहूँ,

पर हर मोड़ पे बस, तिरस्कार ही सहूँ,

मैं घर की बड़ी बहू, मैं घर की बड़ी बहू…


अंतरा 3

त्याग की गठरी सिर पर उठाई,

ख़्वाहिशें अपने हाथों दबाई,

हर बहू को बेटी सा अपनाया,

पर मुझे कभी बेटी ना बुलाया,

अब बैठी हूँ इस सूने से कमरे में,

दुआएँ अब भी पलती हैं दिल के कोनों में…


मुखड़ा (समापन)

दिल ने तो चाहा था, सबको अपना कहूँ,

पर हर मोड़ पे बस, तिरस्कार ही सहूँ,

मैं घर की बड़ी बहू, मैं घर की बड़ी बहू…


        - by Aashu Chandra 🖊 


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