मैं हूँ और परेशान बहुत हूँ – अपने ही लोगों से हैरान एक भावुक कविता

"मैं हूँ और परेशान बहुत हूँ" – यह कविता हमारे जीवन के उस दर्द को बयाँ करती है जब अपने ही लोग हमें समझने के बजाय सवाल करते हैं। रिश्तों की उलझनों और अपनों के व्यवहार से हैरान दिल की गहराई इस भावुक कविता में झलकती है। ब्लॉग पढ़ें और महसूस करें अपनेपन की सच्चाई।


कविता:

अपनों की दुनिया में, मैं अजनबी-सा क्यों लगता हूँ,

हँसी के मेले में भी, अंदर से टूटा-सा रहता हूँ।

वो पहचान जिन्हें अपनेपन का नाम देता था,

आज वही आईने में सवाल बनकर खड़ा मिलता हूँ।


हाँ, मैं हूँ... और परेशान बहुत हूँ,

अपने ही लोगो के लिए, क्रित्य से हैरान बहुत हूँ...

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बातें सुनते हो तुम, पर समझते नहीं हो,

मेरी चुप्पी को ग़लत अर्थों में परखते नहीं हो।

दिल का बोझ जब लफ़्ज़ों में उतरता है,

तो लोग कहते हैं—“ये तो बस कहने की आदत है।”


हाँ, मैं हूँ... और परेशान बहुत हूँ,

अपने ही लोगो के लिए, क्रित्य से हैरान बहुत हूँ...

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सपनों के शहर में, उम्मीदें टूटी सी पड़ी हैं,

रिश्तों की किताब में, खाली पन्ने जुड़ी हैं।

फिर भी मैं चलता हूँ, गिरकर सँभलता हूँ,

आँधियों के बीच भी, अपने होने का ऐलान करता हूँ।


हाँ, मैं हूँ... और परेशान बहुत हूँ,

अपने ही लोगो के लिए, क्रित्य से हैरान बहुत हूँ...


"ज़िंदगी का सच यही है — जो अपना है, वही सबसे गहरा ज़ख़्म देता है।"


✍️ — Aashu Chandra


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