वो बड़ा भाई: जो सबका था, पर ख़ुद का कभी न हो सका

 - by Aashu Chandra 🖊 

"जिसने बचपन छोड़ा, ताकि सबका भविष्य बन सके…"
"ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत… बस कंधों पर ज़िम्मेदारियाँ थीं।"
"एक भाई, जिसने पिता की जगह ली… और ख़ुद को भुला दिया।"

इस कविता में भाव है उस भाई के,

जिसने अपने सपनों को तब कुर्बान कर दिया, जब उसके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं।

जिसने सबके लिए जीया,
पर आज जब मुड़कर देखता है —
तो पाता है कि शायद कोई उसका नहीं रहा…
बस एक डिब्बा, एक कहानी और एक खामोशी बची है।

"बड़ा भाई"

पंद्रह की उम्र में बाप बन गया,
कंधों पर जनमों का बोझ ले लिया।
सबको संवारते-संवारते ख़ुद बिखर गया,
वो बड़ा भाई, जो सबका था… पर ख़ुद का कभी न हो सका।

पिता गया, घर टूटा,
पर उसने दीवार बन के सबको जोड़ा।
रातें जाग कर सबका ख्याल रखा,
और सुबहें काम में पसीने से नहाई।

भाई पढ़े, बहनें ब्याही,
माँ के लिए दवाई और दुआ लाया।
हर त्यौहार में सबको हँसाया,
पर अपने हिस्से की खुशी कभी न पाई।

वो भी चाहता था बच्चा स्कूल जाए,
पत्नी गहनों में मुस्काए,
पर ज़िम्मेदारियों की दौड़ में
वो कभी घर ही देर से लौट पाए।

आज वही भाई, जिसे सबने सहारा कहा,
एक कोने में बस एक डिब्बे में समा गया।
शरीर लौटा, पर आत्मा तो
वक़्त की धूल में कब की खो गई थी।

अब जब घर में शोर है, रौनक़ है,
तो उसका नाम भी कोई नहीं लेता।
कभी जिसने सबको खड़ा किया —
वो बड़ा भाई, अब सिर्फ़ यादों में रहता…


भावार्थ:
ये कविता सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं —
हर उस इंसान की है जो अपनी उम्र से पहले बड़ा बन गया।
जिसने सबके लिए सपने बुनें,
पर अपने सपने कभी देख ही नहीं सका।

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