खोकर पाया – मेरे पिता श्री महेश चन्द्र की कहानी
खोकर पाया – मेरे पिता श्री महेश चन्द्र की कहानी
महेश सिर्फ़ पंद्रह साल का था, जब उसके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। घर में चार भाई, दो बहनें, बूढ़ी माँ और जिम्मेदारियों का पहाड़।
उस दिन से बचपन खत्म हो गया और एक अधूरा आदमी बनने की शुरुआत हो गई।
महेश ने अपनी जवानी अपने परिवार के नाम कर दी—
छोटे भाइयों को पढ़ाया, बहनों की शादियाँ कराईं, माँ का इलाज कराया, हर त्योहार पर सबके घर में खुशियाँ पहुँचाईं।
वह खुद चाहे पुराने कपड़ों में रहा, लेकिन भाई-बहनों के लिए सबसे अच्छा लाया।
कच्ची छत हटा के उन्हे पक्का मकान दिया...
समय बीता, भाई पढ़-लिखकर बड़े पदों पर पहुँचे, बहनें अपने घर-गृहस्थी में रम गईं।
सब अपना अपना अपना देखने लगे, सब लग गये अपने बच्चो को बनाने मे..
लेकिन महेश…?
उसके पास न घर था, न बचत, न अपने बच्चों के लिए कोई सुरक्षा।
जो कुछ कमाया, सब दूसरों पर लुटा दिया।
और कड़वा सच तो यह था—
माँ ने भी उसे कभी सही मायने में नहीं समझा।
जब भी कोई बात बिगड़ती, घर का हर दोष उसी के सिर मढ़ दिया जाता।
महेश चुपचाप सब सुनता रहा, शायद यही सोचकर कि "परिवार" में खटास नहीं आनी चाहिए।
फिर एक दिन, उसका जीवन थम गया।
उसकी मौत के बाद छोटे भाई-बहन, जो उसके किए हुए त्याग के कर्ज़दार थे,
अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे लगाने से पीछे हट गए।
उल्टा, महेश के बेरोज़गार बच्चों से कहा गया—
"अंतिम संस्कार तो करना ही है, पैसे जुटाओ।"
उस समय महेश के बच्चों की आँखों में आँसू से ज़्यादा आग थी।
उन्होंने देखा कि जिस "परिवार" के लिए उनके पिता ने खुद को मिटा दिया, वही परिवार अब सिर्फ़ ले रहा है, दे कुछ नहीं रहा।
वो बहन ज़िसे महेश की पत्नी बेटी बेटी करती रही, उसी मां समान भाभी पर लांक्षन लगा दिया...
महेश के बड़े बच्चे अपनी मां और पिता के लिये आवाज उठाये तो वो सदा गलत..
क्युकी बाकी सब अपना गुट बना चुके थे,
और हमारा गुट थे हमारे पापा, जो अब जा चुके थे...
वो बच्चे तानो से बड़े हुये और ताने की इसके बाप ने कमा के रख लिया होगा... ये सब ढ़ोंग कर रहे हैं...
क्या ढ़ोंग हां अर्थी पर कारते जब पैसे मांगे गये....
कभी कोई साथ नही खड़ा हुआ कि हमारे लिये सही गलत बोल सके..
पर हमे सबके सामने, सब मिल के गलत बोलते रहे....
वक़्त बदला—
महेश के बच्चे अपनी मेहनत से खड़े हुए, नाम कमाया।
और फिर… वही पुराने रिश्तेदार आ गए,
परिवार-परिवार खेलते हुए, उम्मीदें लेकर—
"तुम्हारे पापा की तरह तुम भी हमारा साथ दो।"
लेकिन इस बार कहानी वही नहीं रही।
महेश के बच्चों ने मुस्कुराकर कहा—
"हमारे पिता का दिल बड़ा था, लेकिन उस दिल को सिर्फ़ लूटा गया।
हम वो गलती नहीं दोहराएँगे।"
परिवार का नक़ाब उतर चुका था।
महेश का असली परिवार अब उसके अपने बच्चे थे—
और यही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच था।
- by Aashu Chandra 🖊
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