सब धरा रह जाएगा – लोभ, ताक़त और पछतावे पर जीवन की सच्ची कविता

"सब धरा रह जाएगा"


सब धरा रह जाएगा,
जब अचानक से बुलावा आएगा।
ना तेरा धन, ना तेरी शोहरत,
ना तेरा पद, ना तेरी ताक़त—
कुछ भी साथ ना जाएगा,
बस कर्मों का हिसाब आएगा।

तू दौड़ा लूटने को हर मोक़ा,
छीन ली तूने अपनों की रोशनी का शोला,
इज्ज़त बांटने में तुझसे क्यों कंजूसी हुई?
पर अपमान देने में तुझसे जल्दी हुई।

तूने समझा था कि सब तेरे आगे झुकेंगे,
तेरे नाम से दरवाज़े खुलेंगे,
पर एक दिन तेरे सामने दरवाज़ा बंद होगा,
जिसे कोई रिश्वत, कोई ताक़त,
कोई सिफ़ारिश नहीं खोलेगी।

वक़्त चुपचाप हिसाब रखता है,
ताक़त की घड़ी,
और कमजोरी का पल—
दोनों लिखता है।
जब बुलावा आएगा,
तू अकेला होगा…
भीड़ भी तुझसे दूर खड़ी होगी।

तब समझ आएगा,
दौलत बाँटनी थी, इज्ज़त देनी थी,
मोह माया छोड़कर सच्चाई जीनी थी।
पर तब तक देर हो चुकी होगी…
और सब धरा रह जाएगा।

       - by Aashu Chandra 🖊 


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