पिता की चिता से मज़बूत बनने तक – मेरी अधूरी कहानी
जिस दिन मैंने अपने पिता को अंतिम बार कांधा दिया, उसी दिन शायद मैं ख़ुद को खो बैठा और एक नया मैं जन्म ले लिया।
वो दिन मेरे जीवन का सबसे काला दिन था—जिसे याद करते हुए आज भी दिल कांप जाता है।
पिता की मौत के बाद ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी ने अचानक मेरे कंधों पर बोझ डाल दिया हो। कल तक मैं नासमझ और बेफ़िक्र सा था, लेकिन उस एक दिन ने मुझे पल भर में बूढ़ा कर दिया। जो हाथ बचपन से मेरी उंगली थामे हुए थे, वो हाथ आज सदा के लिए छूट गए।
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अपनों से दूर होते हुए भी मज़बूत होना
सबसे बड़ा दर्द मौत का नहीं था, बल्कि वो था जब अपने ही सगे धीरे-धीरे किनारा करने लगे।
तानों के तीर चले—
कभी मेरे पिता पर,
कभी मेरी माँ पर,
कभी मेरी बहनों पर...
जिनसे सहारा मिलने की उम्मीद थी, वही सिर्फ़ बोझ समझने लगे।
उस समय समझ आया कि लोग साथ तब तक हैं जब तक आपके पास कुछ है देने को। और जब आप टूटा हुआ इंसान होते हो, तब वही अपनों का झुंड सबसे पहले दूरी बना लेता है।
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मजबूरी से मज़बूती तक का सफर
मैंने न रोने दिया खुद को ज़्यादा, न गिरने दिया।
क्योंकि हर रात जब आँसू बहते थे, अगली सुबह मुझे और मज़बूत होना पड़ता था।
जैसे-जैसे लोग दूर होते गए, वैसे-वैसे मैं अंदर से मजबूत होता गया।
पिता के बिना ज़िंदगी चलाना आसान नहीं था, मगर यही सच्चाई थी कि अब मुझे ही पिता बनना था—अपनी माँ के लिए, अपनी बहनों के लिए और सबसे बढ़कर ख़ुद अपने लिए।
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अनजाने में बड़ा बन जाना
आज सोचता हूँ, मैं कब इतना बड़ा हो गया?
कब वो बेपरवाह लड़का अचानक जिम्मेदार बन बैठा?
कब वो आवारा सा इंसान इतना गंभीर हो गया कि अब चेहरे पर मासूमियत से ज़्यादा बोझ झलकने लगा?
शायद उस दिन...
जब मैंने पिता को कांधा दिया।
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अंत में
ज़िंदगी ने मुझे तोड़कर ही जोड़ा है।
लोगों ने छोड़कर ही मुझे संभलना सिखाया है।
और शायद यही वजह है कि आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है—
पिता के जाने के बाद मैं टूटा नहीं, बल्कि और मजबूत हो गया।
लेकिन सच ये है कि उस मजबूती की कीमत मेरे बचपन, मेरी मासूमियत और मेरे पिता की यादें हैं।
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