हर किसी को संभालते-संभालते, वो खुद कहाँ खो गया — किसी ने न पूछा
- by Aashu Chandra 🖊
एक टूटा हुआ मन…
एक थका हुआ कंधा…
एक ऐसा इंसान, जो बस एक बार चाहता है कि कोई पूछे –
"तू कैसा है?"
"वो शब्द – जो कह नहीं पाया"
ना कोई शिकवा, ना कोई फ़रियाद की,
बस हर रिश्ता पूरी ईमानदारी से निभा दी।
पर जो बात दिल में सबसे ज़्यादा थी,
वो कभी अपनी बीवी-बच्चों से कह ना सका…
मैंने पिता का साया बनके तुम सबको पाला,
हर ज़िम्मेदारी को खुद से पहले टाला।
तुम्हें हँसते देख कर अपने आँसू पी लिए,
पर कभी न बताया…
कि हर मुस्कान के पीछे,
मेरे हिस्से की नींदें, ख्वाब, चैन, सब चले गए।
घर चलाया, रिश्ते बचाए,
कभी छोटे भाई की फ़ीस,
तो कभी बहन की शादी में जान लगा दी।
और जब अपना बच्चा किताबें माँगता था,
तो मन ही मन टूटता था…
क्योंकि जेबें खाली थीं —
पर चेहरा फिर भी मुस्कराता रहा।
बीवी से कभी कुछ नहीं माँगा,
ना सुकून, ना समझ, ना सहारा।
बस वो मुस्कुरा दे, यही दुआ करता रहा।
पर एक बार चाहता था कि वो समझे —
कि उसका आदमी सिर्फ़ ATM नहीं,
एक थका हुआ इंसान भी है…
मेरे बच्चों…
तुम्हें पंख देना मेरा सपना था,
इसलिए अपनी उड़ानें रोक दीं।
पर अब जब तुम ऊँचाइयों पर हो,
बस इतना पूछ लो —
"पापा… आप ठीक हो?"
कहने को बहुत कुछ है,
पर अब आवाज़ थक चुकी है।
बस दिल कहता है —
काश कभी तुम सब पूछो…
"आपने खोया क्या?"
तो मैं कह पाऊँ —
"खुद को.....!!!!!!!!!!!
भावार्थ:
हर बड़ा भाई, हर पिता, हर मर्द सब कुछ सह जाता है…
पर अपने मन की बात नहीं कह पाता।
ये कविता उन सारे अनकहे शब्दों को आवाज़ देने की कोशिश है।
#BhaiKaDard #FatherFigure #SilentWarrior #EmotionalTruth
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