जब शब्द मर गए और बस ज़हर बचा

 पिता के बाद जिस घर में रोशनी जलनी थी,

वहाँ अँधेरे ने अपना ताज पहन लिया,

जिन्हें अपना समझा था, वही दूरियाँ नापते रहे,

मेरे आँसुओं से उनके दरवाज़े भीगते रहे,

और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया।


रोटियों की तलाश में कई बरस काले हो गए,

जेब में छेद थे और सपने राख हो गए,

जिनके लिए रातों का सारा चैन बेच डाला,

सुबह उन्होंने ही मेरे सिर पर पत्थर डाला,

और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया।


बेरोज़गारी ने हर दिन का गर्व निचोड़ लिया,

भीड़ में मेरा नाम किसी ने नहीं जोड़ा लिया,

जिनके काँधों पर मैं आंधी में भी छाया बना,

आज वही मुझे देख कर रास्ता बदलने लगे,

और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया।


अब दिल को किसी अपने की तलाश नहीं,

सिर्फ कुछ चेहरे हैं जो अब भी हवा देते हैं सही,

बाक़ी सब मेरे किस्सों के कब्रिस्तान में सो गए,

बस मैं और मेरी ख़ामोशी इस दुनिया से हो गए,

और मेरी चुप्पी का ज़हर, नसों में और गाढ़ा बहता गया।


- by Aashu Chandra 🖊 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घर की बड़ी बहू का दर्द – भेदभाव और तिरस्कार पर भावुक कविता

A journey from English School, Hostel and Old Age Home

अनपढ़ कुछ पढ़े लिखो से बेहतर हैं...